मेवाड के सिसौदिया राजवंश एवं इसके प्रतापी शासक
हम्मीर (1326–1364 ई.) — सिसोदिया शाखा का प्रवर्तन
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सिसोदा (राजसमंद) का सामंत; यहीं से सिसोदिया शाखा प्रारंभ हुई और 'राणा' उपाधि अपनाई गई।
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1326 ई. में मालदेव सोनगरा के पुत्र को हराकर चित्तौड़ पर पुनः अधिकार।
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सिंगोली (बांसवाड़ा) युद्ध में मुहम्मद-बिन-तुगलक को हराया। कर्नल टॉड — 'प्रबल हिन्दू'; मेवाड़ का उद्धारक भी कहा गया।
लाखा / लक्ष सिंह (1382–1421 ई.)
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जावर (उदयपुर) में चाँदी की खान प्राप्त हुई; बंजारे द्वारा पिछोला झील का निर्माण।
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मारवाड़ राजा चूण्डा की पुत्री हंसाबाई से विवाह; शर्त — लाखा का पुत्र चूण्डा राजा नहीं बनेगा, हंसाबाई का पुत्र (मोकल) राजा बनेगा। चूण्डा को 'मेवाड़ का भीष्म' कहा जाता है।
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त्याग के बदले चूण्डा को मेवाड़ के 16 प्रथम श्रेणी ठिकानों में से 4 (सलूम्बर सहित) मिले।
मोकल (1421–1433 ई.)
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संरक्षक — पहले चूण्डा, फिर रणमल।
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एकलिंग मंदिर का परकोटा, चित्तौड़ में समिद्धेश्वर मंदिर का पुनर्निर्माण, द्वारिकानाथ मंदिर बनवाया।
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1433 ई. में चाचा, मेरा व महपा पंवार द्वारा जीलवाड़ा (राजसमंद) में हत्या।
महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.)
पिता — मोकल, माता — सौभाग्यवती परमार। संरक्षक — रणमल।
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रणमल की सहायता से पिता की हत्या का बदला लिया; रणमल का प्रभाव बढ़ने पर उसने सिसोदियों के नेता राघवदेव (चूण्डा भाई) को मरवाया।
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हंसाबाई ने चूण्डा को वापस बुलाया; रणमल भारमली की सहायता से मारा गया। रणमल-पुत्र जोधा भाग कर काहूनी (बीकानेर के पास) गया।
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आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.) — जोधा+कुंभा: सोजत सीमा बना, मंडौर जोधा को लौटाया, कुंभा-पुत्र रायमल की शादी जोधा-पुत्री श्रृंगार कंवर से हुई।
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सारंगपुर युद्ध (1437 ई.) — महमूद खिलजी (मालवा) को पराजित कर बंदी बनाया → स्मृति में विजय स्तम्भ का निर्माण।
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चम्पानेर की संधि (1456 ई.) — महमूद खिलजी + कुतुबुद्दीन शाह (गुजरात) का संयुक्त गठबंधन, उद्देश्य कुंभा को हराना।
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बदनौर युद्ध (1457 ई.) — मालवा-गुजरात संयुक्त सेना को पराजित किया; सिरोही के सहसमल देवड़ा को भी हराया।
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नागौर उत्तराधिकार संघर्ष में हस्तक्षेप — अंततः शम्स खाँ व कुतुबुद्दीन शाह के संयुक्त आक्रमण को भी हराया।
कुंभा की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
स्थापत्य कला
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विजय स्तम्भ — 9 मंजिला, लंबाई 122 फीट; वास्तुकार जैता-पूंजा-पोमा-नापा; प्रशस्ति-लेखक अत्रि व महेश। राजस्थान की पहली इमारत जिस पर डाक टिकट जारी हुआ।
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जैन कीर्ति स्तम्भ — 7 मंजिला, जीजा शाह बघेरवाल द्वारा निर्मित, आदिनाथ को समर्पित।
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किले — वीर विनोद के अनुसार 84 में से 32 किलों का निर्माण, जिनमें कुम्भलगढ़ (वास्तुकार मण्डन, मेवाड़ की आँख), अचलगढ़, बसन्तगढ़, मच्छान दुर्ग, भोमट दुर्ग, बैराठ दुर्ग प्रमुख हैं।
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मंदिर — कुम्भस्वामी मंदिर (चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, अचलगढ़), मीरा मंदिर (एकलिंगजी), रणकपुर जैन मंदिर (1439 ई., निर्माता धरणकशाह, वास्तुकार देपाक)।
साहित्य व संगीत
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स्वयं संगीतज्ञ (वीणा-वादक); संगीत गुरु — सारंग व्यास।
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पुस्तकें — सुधा प्रबंध, कामराज रतिसार, संगीत सुधा, संगीत मीमांसा, संगीत क्रम दीपिका, संगीत राज (5 भाग)।
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टीकाएँ व नाटक — 'रसिक प्रिया' (गीत गोविन्द पर), संगीत रत्नाकर व चंडीशतक पर टीकाएँ; चार नाटक (कन्नड़, मेवाड़ी, मराठी, संस्कृत में)।
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दरबारी विद्वान — कान्ह व्यास, मेहाजी, मण्डन, गोविन्द, रमाबाई (कुंभा-पुत्री), हीरानन्द मुनि आदि। उपाधियाँ — हिन्दू सुरताण, अभिनव भरताचार्य, राणा रासौ।
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1468 ई. में स्वयं के पुत्र उदा (उदयसिंह प्रथम) द्वारा हत्या।
राणा रायमल (1473–1509 ई.)
कुंभा-हत्यारे उदयसिंह प्रथम (1468–1473 ई., जन-अस्वीकृत, अल्पकालीन शासन) के पश्चात कुंभा-पुत्र रायमल मेवाड़ के राणा बने।
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रायमल की रानी जोधा (मारवाड़)-पुत्री श्रृंगार कंवर से हुई थी (आंवल-बांवल संधि के अनुसार)।
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रायमल के तीन पुत्र — पृथ्वीराज, जयमल (संग्रामसिंह/सांगा) व सूरजमल/विक्रमादित्य के पूर्वज — के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष रहा।
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पृथ्वीराज (ज्येष्ठ पुत्र) की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई; सांगा व उनके भाई पृथ्वीराज-पुत्र सूरजमल के बीच भी सत्ता-संघर्ष हुआ, जिसमें सांगा की एक आँख जाती रही।
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रायमल ने कुम्भलगढ़ व चित्तौड़ में कई निर्माण कार्य करवाए तथा मालवा के आक्रमणों को विफल किया।
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1509 ई. में रायमल की मृत्यु के बाद पारिवारिक संघर्ष जीतकर राणा सांगा मेवाड़ के शासक बने।
राणा सांगा / संग्रामसिंह (1509–1528 ई.)
राणा सांगा को मेवाड़ के सबसे शक्तिशाली व वीर शासकों में गिना जाता है — अनेक युद्धों में शरीर पर घाव झेलते हुए भी अपराजित योद्धा की छवि।
शारीरिक क्षति एवं वीरता
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युद्धों में एक आँख, एक हाथ तथा एक पैर में गंभीर घाव/क्षति सहन की — फिर भी युद्धभूमि नहीं छोड़ी।
प्रमुख युद्ध
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खातोली का युद्ध — दिल्ली सल्तनत (इब्राहीम लोदी की सेना) को पराजित किया।
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बाड़ी/धौलपुर का युद्ध — पुनः दिल्ली सल्तनत को पराजित किया।
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गागरोन का युद्ध (1519 ई.) — मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय को पराजित कर बंदी बनाया, फिर सम्मानपूर्वक रिहा किया।
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इन विजयों से सांगा उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली हिन्दू शासक के रूप में उभरे तथा राजपूत संघ का नेतृत्व किया।
बाबर से संघर्ष — खानवा का युद्ध (1527 ई.)
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पानीपत के युद्ध (1526 ई.) में इब्राहीम लोदी की पराजय के बाद सांगा ने बाबर के विरुद्ध राजपूत-अफगान संघ का नेतृत्व किया।
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खानवा (भरतपुर) के युद्ध, 1527 ई. में विशाल राजपूत संघ के बावजूद रायसेन के सिलहदी तोमर के विश्वासघात (युद्ध के बीच पाला बदलने) के कारण सांगा की पराजय हुई।
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युद्ध में सांगा गंभीर रूप से घायल हुए; कुछ ही समय बाद (1528 ई.) उनकी मृत्यु हो गई — कुछ इतिहासकारों के अनुसार अपने ही सरदारों द्वारा विष दिए जाने से, जो पुनः युद्ध छेड़ने के इच्छुक सांगा को रोकना चाहते थे।
सांगा के पश्चात उत्तराधिकार संकट (1528–1537 ई.)
रत्नसिंह द्वितीय (1528–1531 ई.)
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सांगा का ज्येष्ठ पुत्र; अल्पकालीन व अस्थिर शासन; बूँदी के सामंतों से संघर्ष में मारा गया।
विक्रमादित्य (1531–1536 ई.)
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अयोग्य व अलोकप्रिय शासक; सामंतों की उपेक्षा से मेवाड़ की सैन्य-शक्ति कमजोर पड़ी।
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गुजरात के बहादुरशाह का आक्रमण (1534 ई.) — चित्तौड़ पर घेरा; रानी कर्णावती (विक्रमादित्य की माता) ने सहायता हेतु हुमायूँ को राखी भेजने की लोकप्रिय किंवदंती (इतिहासकारों में विवादित)।
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चित्तौड़ का द्वितीय साका (1534–35 ई.) — रानी कर्णावती के नेतृत्व में जौहर व केसरिया; चित्तौड़ पर बहादुरशाह का अस्थायी अधिकार।
बनवीर (1536–1540 ई.) — सत्ता हड़पना
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पृथ्वीराज (रायमल-पुत्र) की अवैध संतान बनवीर ने छल से विक्रमादित्य की हत्या कर सत्ता हथिया ली।
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विक्रमादित्य के छोटे भाई उदयसिंह (बालक) को बनवीर से बचाने हेतु धाय माता पन्नाधाय ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान देकर उदयसिंह को कुम्भलगढ़ भेजा — मेवाड़ के इतिहास का यह त्याग-प्रसंग अत्यंत प्रसिद्ध है।
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1540 ई. में सामंतों की सहायता से बनवीर को अपदस्थ कर उदयसिंह को मेवाड़ का शासक घोषित किया गया।
महाराणा उदयसिंह द्वितीय (1540–1572 ई.)
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कुम्भलगढ़ में सुरक्षित पालन-पोषण के बाद 1540 ई. में मेवाड़ के शासक बने।
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उदयपुर नगर की स्थापना (1559 ई.) — पिछोला झील के किनारे नई राजधानी बसाई; रणनीतिक व सुरक्षित स्थान।
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चित्तौड़ का तृतीय साका (1567–68 ई.) — अकबर द्वारा चित्तौड़ की घेराबंदी; उदयसिंह पूर्व में ही उदयपुर चले गए थे। सेनापति जयमल राठौड़ (बीकानेर) व पत्ता सिसोदिया के नेतृत्व में वीरतापूर्ण प्रतिरोध व केसरिया, तथा रानियों का जौहर हुआ।
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अकबर ने जयमल व पत्ता की वीरता के सम्मान में आगरा किले के द्वार पर इनकी हाथी पर सवार प्रतिमाएँ स्थापित करवाईं।
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1572 ई. में उदयसिंह की मृत्यु; उत्तराधिकार में ज्येष्ठ पुत्र जगमाल की उपेक्षा कर सामंतों ने प्रताप को राणा घोषित किया।
महाराणा प्रताप (1572–1597 ई.)
महाराणा प्रताप मेवाड़ ही नहीं, संपूर्ण भारतीय इतिहास में स्वाभिमान, संघर्ष व मातृभूमि-प्रेम के प्रतीक माने जाते हैं।
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राज्याभिषेक — 1572 ई. में गोगुन्दा में हुआ।
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अकबर की अधीनता स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार किया, जबकि अन्य कई राजपूत शासकों ने मुगल अधीनता स्वीकार कर ली थी।
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अकबर ने संधि-वार्ता हेतु कई दूत भेजे (जलाल खाँ कोरची, मानसिंह, भगवानदास, टोडरमल) — सभी असफल रहे।
हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576 ई.)
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मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह (आमेर) ने किया; प्रताप की सेना अपेक्षाकृत छोटी थी परन्तु अत्यंत साहसी।
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प्रताप का घोड़ा चेतक इस युद्ध में अमर हो गया — घायल प्रताप को युद्धक्षेत्र से सुरक्षित निकालते हुए चेतक ने प्राण त्यागे।
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झाला मानसिंह ने प्रताप के राजचिह्न धारण कर उनकी जान बचाई और स्वयं वीरगति को प्राप्त हुए।
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युद्ध का परिणाम अनिर्णीत/मुगलों के पक्ष में सामरिक बढ़त माना जाता है, किन्तु प्रताप मैदान से सुरक्षित निकल गए और संघर्ष जारी रखा।
संघर्ष व पुनर्निर्माण
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हल्दीघाटी के बाद भी प्रताप ने गुरिल्ला (छापामार) युद्ध-नीति अपनाकर संघर्ष जारी रखा; भीलों का महत्वपूर्ण सहयोग मिला।
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व्यापारी भामाशाह ने अपनी सम्पूर्ण संपत्ति प्रताप को अर्पित कर सेना के पुनर्गठन में सहायता की।
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प्रताप ने दिवेर के युद्ध सहित कई अभियानों में मेवाड़ का अधिकांश भू-भाग (चित्तौड़, मांडलगढ़ व अजमेर को छोड़कर) पुनः प्राप्त कर लिया।
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नई राजधानी के रूप में चावंड को स्थायी केन्द्र बनाया।
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1597 ई. में चावंड में महाराणा प्रताप का निधन हुआ।
महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597–1620 ई.)
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प्रताप के पश्चात मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा; जहाँगीर ने बार-बार सैन्य अभियान भेजे।
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मेवाड़ की संधि (1615 ई.) — जहाँगीर के पुत्र शहजादा खुर्रम (बाद में शाहजहाँ) के प्रयासों से हुई; इसमें मेवाड़ को अपेक्षाकृत सम्मानजनक शर्तें मिलीं — मुगल दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति की बाध्यता नहीं तथा वैवाहिक संबंध की शर्त नहीं थोपी गई, जो अन्य राजपूत घरानों से भिन्न रही।
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इस संधि के साथ मेवाड़ का लंबा स्वतंत्रता-संघर्ष औपचारिक रूप से समाप्त हुआ, यद्यपि मेवाड़ ने अपना विशिष्ट स्वाभिमान बनाए रखा।
परवर्ती शासक (संक्षिप्त परिचय)
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कर्णसिंह (1620–1628 ई.) — शाहजहाँ के साथ मधुर संबंध; मुग़ल शहजादे को शरण दी।
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जगतसिंह प्रथम (1628–1652 ई.) — जगमंदिर व जगनिवास महलों का निर्माण (शाहजहाँ के पुत्र खुर्रम को शरण देने से जुड़ा प्रसंग)।
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राजसिंह प्रथम (1652–1680 ई.) — राजसमंद झील का निर्माण; औरंगजेब की धार्मिक नीतियों (जज़िया कर) का विरोध किया।
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इसके बाद के शासकों के काल में मेवाड़ मुग़ल सत्ता के पतन तथा मराठा प्रभाव के दौर से गुजरा।
शासकों की संपूर्ण सारणी (एक नज़र में)
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शासक |
काल (ई.) |
प्रमुख कार्य / घटना |
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गुहिल |
566 |
वंश की स्थापना |
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बापा रावल |
734–753 |
चित्तौड़ विजय, एकलिंगजी मंदिर |
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अल्लट |
10वीं सदी |
नौकरशाही, आहड़ राजधानी |
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जैत्रसिंह |
1213–1253 |
भूताला युद्ध, इल्तुतमिश पराजय |
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रत्नसिंह |
1302–1303 |
प्रथम साका, पद्मिनी जौहर |
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हम्मीर |
1326–1364 |
सिसोदिया शाखा, सिंगोली युद्ध |
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लाखा |
1382–1421 |
पिछोला झील, चूण्डा त्याग |
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मोकल |
1421–1433 |
मंदिर निर्माण, हत्या |
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कुंभा |
1433–1468 |
विजय स्तम्भ, 32 किले, साहित्य |
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रायमल |
1473–1509 |
उत्तराधिकार संघर्ष का समाधान |
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राणा सांगा |
1509–1528 |
खातोली, गागरोन विजय; खानवा में पराजय |
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रत्नसिंह द्वितीय |
1528–1531 |
अस्थिर शासन |
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विक्रमादित्य |
1531–1536 |
द्वितीय साका (बहादुरशाह आक्रमण) |
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बनवीर |
1536–1540 |
सत्ता हड़पना; पन्नाधाय बलिदान |
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उदयसिंह द्वितीय |
1540–1572 |
उदयपुर स्थापना; तृतीय साका |
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महाराणा प्रताप |
1572–1597 |
हल्दीघाटी युद्ध, चेतक, चावंड |
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अमरसिंह प्रथम |
1597–1620 |
मेवाड़ की संधि (1615) |
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